द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संसार में शांति और व्यवस्था कायम करने के इरादे से वर्ष 1954 में संसार के 189 स्वतंत्र राष्ट्रों ने मिलकर एक अंतराष्ट्रिय संगठन संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की थी। इस संस्था का महत्वपूर्ण उद्देश्य यह भी था की संसार में सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा दिया जाए और यह सुनिश्चित किया जाए की दुनिया भर में मानवाधिकारों का सम्मान हो।
अंतराष्ट्रिय श्रम संगठन ( आई.एल.ओ.) ने आदिवासिओं के लिए वर्ष 1957 में एक समझौता 107 एवं वर्ष 1989 में संशोधित समझौता 169 पारित किया। उपरोक्त अनुबंधों ने आदिवासिओं के निम्लिखित दो स्तारिये दृष्टिकोण दिए -1 जिनकी हैसियत पूरी तरह या आंशिक तौर पर अपने रीति -रिवाजों, परम्पराओं या विशेष नियमों और नियंत्रणों द्वारा संचालित होती है। 2-जिन्हें ऐसी जनसंख्याओं का वंशज होने के कारण आदिवासी माना जाता है, जो देश पर विजय, उपनिवेशीकरण या मौजूदा सीमाओं के स्थापित होने के पहले कुछ देश या उसके भौगोलिक क्षेत्र में रह रहे थे और जिन्होंने अपनी कानूनी हैसियत की परवाह किए बिना अपनी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक संस्थाएं पूरी तरह से या कुछ हद तक बचाए रखी है। इस तरह से आदिवासिओं की परिभाषा के मुख्य पहचान इस प्रकार हैं –
1– राज्य की संस्थाओं और व्यापक समाज में वे एक निचले दर्जे का स्थान रखते हैं और कभी-कभी वे जातीय भेदभाव से मिलकर होते हैं।
2-ये सामूहिक रूप से अपने पुराने रीति -रिवाजों को बरक़रार रखते हुए जीवनयापन कर रहे हैं। और अपनी पुरानी मान्यताओं के कारण ही वे अन्य समूहों से अलग पहचान बनाते हैं।
3– परंपरागत प्राकृतिक संसाधनों पर सदियों से उनका मालिकाना हक़ रहा है, लेकिन उस संसाधनों के आजादी पूर्वक उपभोग से उन्हें वंचित किया जाता रहा है।
4– आदिवासी लोग किसी सीमा मैं रहनेवाले मूळ लोगों के वंशज हैं, और विदेशी उपनिवेशवादी ताकतों द्वारा इतिहासिक रूप से शोषित है।
आर्श्चय है भारत ने इस पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर किया। संयुक्त राष्ट्र संघ के आर्थिक और सामाजिक परिषद् ने अल्पसंखयकों के प्रति भेदभाव रोकने और उनकी रक्षा करने के मुद्दे पर गठित उप आयोग को आदिवासिओं दे खिलाप भेदभाव पर जाँच पड़ताल करने के लिए 1972 में अधिकृत किया। Equador के जोस मार्टिनेज कोबे को यह जाँच पड़ताल करने के लिए नियुक्त किया गया। कोबे ने 1986 में अपनी जाँच पूरी की।
वर्ष 1982 में आदिवासी आबादियों पर संयुक्त राष्ट्र के कार्यदल (UNWGEP) का गठन किया गया। वर्ष 2006 तक प्रत्येक वर्ष इस कार्यदल की बैठक होती रही। इस कार्यदल के क्रियाकलापों में संसार के प्रतिनिधियों, आदिवासियों ने भाग लिया। विश्व भर के आदिवासिओं की अपनी सांस्कृतिक, सामाजिक, एवं आर्थिक धरोहरों की रक्षा के लिए निरंतर संघर्षों की भावना को देखते हुए सर्वप्रथम 1992 में संयुक्त राष्ट्र संघ की आमसभा में यह तय किया गया की ऐसी कोई मुकम्मल नीति बनाई जाए जो आदिवासी समुदायों को विश्व स्तर पर एकसूत्र में बाँध सके। चूँकि कई देशों ने आदिवासिओं को जातिय अल्पसंख्यक की तरह मान्यता नही दी थी, अत: 1992 के अंतराष्ट्रिय मानवाधिकार दिवस में इस विषय पर चर्चा की गई की आदिवासिओं के अधिकारों पर विश्वव्यापी घोषणा के प्रस्ताव को राष्ट्र संघ की साधारण सभा द्वारा अग्रसारित किया जाए। अंतत: 1993 में संयुक्त राष्ट्र कार्यदल के 11 वें सत्र में आदिवासी अधिकार घोषणा प्रारूप को मान्यता दी गई और उसी वर्ष के 9 अगस्त से अंतराष्ट्रिय आदिवासी दिवस मनाने की शुरुआत हुई। इस घोषणा पत्र में कुल 43 धाराओं का जिक्र है, जिसमें आदिवासी लोगों के आत्मनिर्णय के साथ-साथ उनकी संस्कृति, धर्म,शिक्षा, सूचना, संचार, स्वस्थ्य, आवास, रोजगार, सामाजिक कल्याण, आर्थिक गतिविधियाँ, भूमि एवं प्राकृतिक संसाधन प्रबंध, प्रयावरण और गैर आदिवासिओं के प्रवेश आदि विषयों को रखा गया और इन विषयों में से एक स्वायत कार्यों की वित्तीय उपलब्धता भी शामिल था। वर्ष 1995 में मानवाधिकार आयोग की स्थापना की गई, और उपरोक्त प्रारूप पर आगे काम बढ़ाने के लिए अन्तर सत्र कार्यदल का गठन किया गया। क्योंकि उक्त प्रारूप को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के समक्ष प्रस्तुत करना था। विभिन्न देशों के सरकारी प्रतिनिधिओं के साथ आदिवासिओं को भी इस सभा में भाग लेने का अवसर दिया गया। मानवाधिकार परिषद् ने 29 जून 2006 को घोषणा के संशोधित प्रारूप को स्वीकार किया और उसे महासभा को पेश किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने नवम्बर 2006 में अन्तिम निर्णय को किसी कारण वश टाल दिया। अंतत: 13 सितम्बर 2007 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने कुछ परिवर्तनों के साथ घोषणा को स्वीकार किया। इस बार भारत को भी आदिवासिओं से लगातार संघर्षों एवं अंतराष्ट्रिय दबाव के कारण ही सही घोषणा पत्र में हस्ताक्षर करना पड़ा। सिद्दांतत: अब भारत आदिवासिओं के हक़ और अधिकारों से मुह नही मोड़ सकता। संयुक्त राष्ट्र संघ की नीति के अनुरूप आदिवासिओं को इंडिजिनस पीपुल के तमाम आधिकार देते इन्हें अपनी संस्कृति, परम्परा और जीवन शैली के अनुरूप अपना विकास का मौका देने के लिए सरकारें बाध्य हैं।

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1 Comment

vijay omong · December 24, 2019 at 10:58 am

i live in India.my nameis vijay omong. I am a adivasi. I am proud of my all country Adivasasi broTher and sister. Our festival 09 augest all adivasi day.

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