हो समुदाय में ‘शादी-विवाह’ का अशुभ मुहूर्त दूल्हा का जन्म दिन या दिवस और दूल्हन का जन्म दिन या दिवस होता है। क्योंकि, इन दो दिन या दिवस को जन्म छूत माना जाता है। एक वर्ष यानि बारह माह या मास में दो माह या मास अशुभ माना जाता है। एक होता है, पौष मास और दूसरा भादो मास को अशुभ माना जाता है। पौष मास को शादी-विवाह रचाने पर धन-दौलत की हानि होती है। दूसरा भादो मास को शादी-विवाह रचाने पर मान-सम्मान की हानि होती है।

हो समुदाय में दूल्हा का हल्दी लेपन के समय अपने आँगन में पूरब की ओर मुँह करके दाहिनी ओर बैठने का पवित्र प्रचलन है। और अपनी फूफी या मामी के द्वारा ही श्रीगणेश करने का रिवाज होता है। फिर, उसके शरीर के अंगो में सात बार लगाने का प्रचलन है। यह इसलिए, कि दुपुब् दिषुम मरं वोंगा का साक्षी होता है। और सौर उर्जा का धनात्मक आवेश को प्राप्त करने को शुभ प्रतीक माना जाता है।

हो समुदाय में दुल्हन का हल्दी लेपन के समय अपने आँगन में पूरब की ओर मँह करके दाहिनी ओर बैठने को पवित्र प्रचलन है। और अपनी फूफी या मामी के द्वारा ही हल्दीलेपन का श्रीगणेश करने को रिवाज होता है। फिर, उसके शरीर के अंगो में सात बार लगाने का प्रचलन है। यह इसलिए, कि दुपुब् दिषुम मरं वोंगा का साक्षी माना जाता है। और सौर उर्जा का धनात्मक आवेश को प्राप्त करने का शुभ प्रतीक माना जाता है।

हो समुदाय में दुल्हन का हल्दी लेपन के समय अपने आँगन में पूरब की ओर मँह करके दाहिनी ओर बैठने को पवित्र प्रचलन है। और अपनी फूफी या मामी के द्वारा ही हल्दीलेपन का श्रीगणेश करने को रिवाज होता है। फिर, उसके शरीर के अंगो में सात बार लगाने का प्रचलन है। यह इसलिए, कि दुपुब् दिषुम मरं वोंगा का साक्षी माना जाता है। और सौर उर्जा का धनात्मक आवेश को प्राप्त करने का शुभ प्रतीक माना जाता है।

हो समुदाय में शादी-विवाह के पूर्व घर देखा होने का प्रचलन होता है। घर देखा दोनों पक्षों में होने का प्रचलन होता है। इसके बाद ही बपाला होना अनिवार्य मानो जाता है। घर देखा दोनों पक्षों में होने का प्रचलन होता है। यह प्रक्रिया भी दोनों पक्षों में होने का प्रचलन होता है। बपाला होना दूल्हा के घर में पहले आयोजन होता है।

उसके बाद दुल्हन के घर में आयोजन होने का प्रचलन है। इसी दिन ही दूल्हन के आँगन में गोनोड. सिड् करने का पवित्र रिवाज होता है। गोनोड सिड् के समय चटाई को पूरब-पश्चिम दिशा में ही बिछाने का पवित्र रिवाज होता है। पूरब दिशा में दूल्हा पार्टी को बैठने का पवित्र रिवाज होता है। और पश्चिम दिशा में दूल्हन पार्टी को बैठने का पवित्र रिवाज होता है। क्योंकि, दूल्हा पार्टी को सूरज का प्रतीक माना जाता है। और दूल्हन पार्टी को चाँद का प्रतीक माना जाता है।

इन दोनों पक्षों में आते-जाते समय रास्ते में जो अशुभ कृतियाँ दिखाई देता है, उन अशुभ कृतियों को चुना जाता है।कोई भी अशुभ कृतियाँ दिखाई दे, तो किसी अच्छे पण्ति (पाण्डाइत) के द्वारा बीच रास्ते में पूजा-पाठ कराने का पवित्र रिवाज है। और इसी दिन ही शादी विवाह का दिन एवं तिथि तय किया जाता है।

हो समुदाय में शादी-विवाह का आयोजन लड़का के घर में होने का रिवाज पवित्र माना जाता है। क्योंकि, लड़का को दुपुब मरं वोंगा का प्रतीक माना जाता है। और लड़की को चनलः दिषुम मरं वोंगा का प्रतीक माना जाता है। क्योंकि शादी-विवाह के बाद भी लड़का (दुल्हा) का गोत्र (किलि) जैसे का तैसा रहता है। मगर शादी-विवाह के बाद लड़की(दुल्हन) का गोत्र (किलि) लोप हो जाता है। और लड़की का गोत्र (किलि) लड़का को गोत्र (किलि) में परिवर्तन या विस्थापन हो जाता है। लड़का की शादी को कोडाँदि कहा जाता है।

हो समुदाय में लड़की की पवित्र शादी-विवाह को गोड कहा जाता है। इसलिए सामथर्य के अनुसार उपहार के रुप में गोनोड लेन-देन करने का पवित्र रिवाज हुआ। और अजि हनर के लिए चिण्डि षिम चिण्डि-मेरोम लेन-देन का

पवित्र रिवाज हुआ। हो समुदाय में दहेज प्रथा का प्रचलन नहीं होता है। अजि हुनर के साथ उपुरुम-चिपिनब के लिए ही चिण्डि षिम का पवित्र प्रचलन हुआ। और हातोम हुनर के साथ उपुरुम-चिपिनब के लिए ही चिण्डि मेरोम का पवित्र प्रचलन हुआ।

हो समुदाय में लड़का के आँगन में बेदी मण्डप बनाने का पवित्र रिवाज होता है। बेदी मण्डप बनाने के लिए दूल्हा के देषाउलि चौही की मिट्टी लाने का प्रचलन होता है। वहाँ पर देषाउलि को एक लाल मुर्गा की बलि (हड् करसा) चढ़ाया जाता है। और सात कोचोम्बा में सोम रस अर्पित करने का पवित्र रिवाज होता है।

हो समुदाय में लड़की की बिदाई के समय लड़की के पवित्र गइँश्री स्थान में सात फेरा साकि सुताम बाँधने का पवित्र रिवाज होता है। पवित्र गइँश्री स्थान में आम के पेड़ में सात फेरा साकि सुताम बाँधने के साथ ही सात कोचोम्बा में सोम रस अर्पण करने का पवित्र रिवाज होता है। अपनी बेटी और दामाद को भी पवित्र गइँश्री स्थान से ही बिदाई दिया जाता है।

दुल्हन के पवित्र गइँश्री स्थान में ही सारातियों (ओर एराको) को दुल्हन के मामा की ओर से स्वागत करने का पवित्र रिवाज माना जाता है। शादी-विवाह के उपलक्ष में इस पवित्र गइँश्री स्थान से ही सभी बालाओं को भी बिदाई देने का प्रचलन शुभ माना जाता है।

दूल्हा के गइँश्री स्थान में ही सारातियों (ओर एराको) एंव दूल्हन को दूल्हा के मामा की ओर से स्वागत करने का पवित्र रिवाज होता है। यहाँ पर आ दाटा के लिए एक काली मुर्गी को बलि चढ़ाया जाता है।

दूल्हा के आँगन में दूल्हन को प्रायश्चित करने के लिए एक लाल मुर्गी की बलि (हड् करसा) चढ़ाने का पवित्र रिवाज होता है। और दूल्हन को बेदी मण्डप की चारों ओर सात फेरा लगाने का भी पवित्र रिवाज होता है यह इसलिए कि आज से वह दूल्हन उस घर आँगन की बहू के रुप में मन्यता दिया जाता है।

दूल्हा के गइँश्री स्थान में ही सारातियों (ओर एराको) एंव दूल्हन को दूल्हा के मामा की ओर से स्वागत करने का पवित्र रिवाज होता है। यहाँ पर आ दाटा के लिए एक काली मुर्गी को बलि चढ़ाया जाता है।

दूल्हा के आँगन में दूल्हन को प्रायश्चित करने के लिए एक लाल मुर्गी की बलि (हड् करसा) चढ़ाने का पवित्र रिवाज होता है। और दूल्हन को बेदी मण्डप की चारों ओर सात फेरा लगाने का भी पवित्र रिवाज होता है यह इसलिए कि आज से वह दूल्हन उस घर आँगन की बहू के रुप में मन्यता दिया जाता है।

दूल्हन को दूल्हा के मामा की ओर से श्रीश्री श्रंगार करना अनिवार्य माना जाता है। और वह भी सखुआ पत्ता के डण्ठल से होलोड से पहले कपाल की बायीं ओर बिन्दी चढ़ाना पवित्र माना जाता है। उसके बाद दायीं ओर भी बिन्दी चढ़ाना पवित्र माना जाता है। क्योंकि इसे अपने दुपुब दिषुम मरं वोंगा से परिचित कराने को रिवाज है। उसी प्रकार होलोड के बीच में सिंदूर से पहले कपाल की बायीं ओर बिंन्दी चढ़ाना पवित्र माना जाता है। उसके बाद होलोड के बीच में दायीं ओर भी बिन्दी चढ़ाना पवित्र माना जाता है।

दूल्हन को आरवा चावल का चूर्ण की गुण्डी ( होलोड) एंव सिंदूर से कपाल में बिन्दी चढ़ाने का पवित्र रिवाज अनिवार्य होता है। पहले आरवा चावल का चूर्ण की गुण्डी ( होलोडः से तथा बाद में सिंदूर से बिन्दी चढाने का पवित्र रिवाज होता है। इसकी आकृति बाहर की ओर होती है। क्योंकि यह चनलः दिषुम मरं वोंगा का प्रतीक माना जाता है।

दूल्हा को दूल्हन के मामा की ओर से श्रीश्री श्रंगार करना अनिवार्य माना जाता है। और वह भी सियाली पत्ता के डण्डल से पहले कपाल की बायीं ओर बाद में दायीं ओर बिन्दी चढ़ाना पवित्र माना जाता है। क्योंकि इसे अपने चनलः दिषुम मरं वोंगा से परिचित कराने का रिवाज है।

दूल्हा को आरवा चावल का चूर्ण की गुण्डी (होलोड) एवं सिंदूर से कपाल में बिन्दी चढ़ाने का पवित्र रिवाज अनिवार्य होता है। पहले आरवा चावल का चूर्ण की गुण्डी (होलोड.) से तथा बाद में सिंदूर से बिन्दी चढ़ाने का पवित्र रिवाज होता है। इसकी आकृति अन्दर की ओर होती है। क्योंकि यह दुपूब दिषुम मरं वोंगा को प्रतीक माना जाता है।

दूल्हा को बेदी के अन्दर पूरब दिशा में ओर उतर की ओर मुँह करके आसन करना शुभ माना जाता है। क्योंकि दूल्हा को सूरज का साक्षी माना जाता है। और उत्तर दिशा को चुम्बकीय उर्जा का धनात्मक आवेश माना जाता है हो समुदाय में सुपारी एवं पान पत्ता का स्थान नही होता है।

दूल्हन को बेदी के अन्दर पश्चिम में और उत्तर की ओर मुँह करके आसन करना शुभ माना जाता है। क्योंकि दूल्हन को चाँद का साक्षी माना जाता है। और उत्तर दिशा को चुम्बकीय उर्जा का धनात्मक आवेश माना जाता है। हो समुदाय में सुपारी एवं पान पत्ता का स्थान नही होता है।

दूल्हा को बेदी के अन्दर हवन कुण्ड की चारों ओर एक-एक कर रोला से सात फेरा चक्कर लगाना शुभ एवं पवित्र माना जाता है। क्योंकि रोला को दुपुब दिषुम मरं वोंगा को प्रतीक माना जाता है। यह प्रक्रिया वामावर्ती दिशा (एतोम कुटि यते को—- कुटि ते) Anti-clockwise में ही चक्कर लगाना शुभ माना जाता है। क्योंकि दूल्हा यानि लड़का को हल जोतना, माण्डा घुमाना भी वामावर्ती दिशा (एतोम कुटि यते को—- कुटि ते) Anti-clockwise में ही घूमने का पवित्र प्रचलन होता है।

दूल्हन को भी बेदी के अन्दर हवन कुण्ड की चारों ओर एक-एक कर लुपुड. से सात फेरा चक्कर लगाना शुभ एवं पवित्र माना जाता है। क्योंकि लुपुड. को चनलः दिषुम मरं वोंगा का प्रतीक माना जाता है। यह प्रक्रिया भी वामावर्ती दिशा में ही चक्कर लगाना शुभ माना जाता है। क्योंकि दूल्हन यानि लड़की को भी किसी पर्व-त्योहारों में नाचना वामावर्ती दिशा (एतोम कुटि यते —- कुटि ते) Anti-clockwise में ही घूमने को पवित्र प्रचलन होता है।

दूल्हा के गइँश्री स्थान में ही सारातियों (ओर एराको) एंव दूल्हन को दूल्हा के मामा की ओर से स्वागत करने का पवित्र रिवाज होता है। यहाँ पर आ दाटा के लिए एक काली मुर्गी को बलि चढ़ाया जाता है।

दूल्हा के आँगन में दूल्हन को प्रायश्चित करने के लिए एक लाल मुर्गी की बलि (हड् करसा) चढ़ाने का पवित्र रिवाज होता है। और दूल्हन को बेदी मण्डप की चारों ओर सात फेरा लगाने का भी पवित्र रिवाज होता है यह इसलिए कि आज से वह दूल्हन उस घर आँगन की बहू के रुप में मन्यता दिया जाता है।

दूल्हन को दूल्हा के मामा की ओर से श्रीश्री श्रंगार करना अनिवार्य माना जाता है। और वह भी सखुआ——के डण्ठल से होलोड से पहले कपाल की बायीं ओर बिन्दी चढ़ाना पवित्र माना जाता है। उसके बाद दायीं ओर भी बिन्दी चढ़ाना पवित्र माना जाता है। क्योंकि इसे अपने दुपुब दिषुम मरं वोंगा से परिचित कराने को रिवाज है। उसी प्रकार होलोड के बीच में सिंदूर से पहले कपाल की बायीं ओर बिंन्दी चढ़ाना पवित्र माना जाता है। उसके बाद होलोड के बीच में दायीं ओर भी बिन्दी चढ़ाना पवित्र माना जाता है।

दूल्हन को आरवा चावल का चूर्ण की गुण्डी ( होलोड) एंव सिंदूर से कपाल में बिन्दी चढ़ाने का पवित्र रिवाज अनिवार्य होता है। पहले आरवा चावल का चूर्ण की गुण्डी ( होलोडः से तथा बाद में सिंदूर से बिन्दी चढाने का पवित्र रिवाज होता है। इसकी आकृति बाहर की ओर होती है। क्योंकि यह चनलः दिषुम मरं वोंगा का प्रतीक माना जाता है।

दूल्हा को दूल्हन के मामा की ओर से श्रीश्री श्रंगार करना अनिवार्य माना जाता है। और वह भी सियाली पत्ता के डण्डल से पहले कपाल की बायीं ओर बाद में दायीं ओर बिन्दी चढ़ाना पवित्र माना जाता है। क्योंकि इसे अपने चनलः दिषुम मरं वोंगा से परिचित कराने का रिवाज है।

दूल्हा को आरवा चावल का चूर्ण की गुण्डी (होलोड) एवं सिंदूर से कपाल में बिन्दी चढ़ाने का पवित्र रिवाज अनिवार्य होता है। पहले आरवा चावल का चूर्ण की गुण्डी (होलोड.) से तथा बाद में सिंदूर से बिन्दी चढ़ाने का पवित्र रिवाज होता है। इसकी आकृति अन्दर की ओर होती है। क्योंकि यह दुपूब दिषुम मरं वोंगा को प्रतीक माना जाता है।

दूल्हा को बेदी के अन्दर पूरब दिशा में ओर उतर की ओर मुँह करके आसन करना शुभ माना जाता है। क्योंकि दूल्हा को सूरज का साक्षी माना जाता है। और उत्तर दिशा को चुम्बकीय उर्जा का धनात्मक आवेश माना जाता है हो समुदाय में सुपारी एवं पान पत्ता का स्थान नही होता है।

दूल्हन को बेदी के अन्दर पश्चिम में और उत्तर की ओर मुँह करके आसन करना शुभ माना जाता है। क्योंकि दूल्हन को चाँद का साक्षी माना जाता है। और उत्तर दिशा को चुम्बकीय उर्जा का धनात्मक आवेश माना जाता है।हो समुदाय में सुपारी एवं पान पत्ता का स्थान नही होता है।

दूल्हा को बेदी के अन्दर हवन कुण्ड की चारों ओर एक-एक कर रोला से सात फेरा चक्कर लगाना शुभ एवं पवित्र माना जाता है। क्योंकि रोला को दुपुब दिषुम मरं वोंगा को प्रतीक माना जाता है। यह प्रक्रिया वामावर्ती दिशा (एतोम कुटि यते को—- कुटि ते) Anti-clockwise में ही चक्कर लगाना शुभ माना जाता है। क्योंकि दूल्हा यानि लड़का को हल जोतना, माण्डा घुमाना भी वामावर्ती दिशा (एतोम कुटि यते को—- कुटि ते) Anti-clockwise में ही घूमने का पवित्र प्रचलन होता है।

दूल्हन को भी बेदी के अन्दर हवन कुण्ड की चारों ओर एक-एक कर लुपुड. से सात फेरा चक्कर लगाना शुभ एवं पवित्र माना जाता है। क्योंकि लुपुड. को चनलः दिषुम मरं वोंगा का प्रतीक माना जाता है। यह प्रक्रिया भी वामावर्ती दिशा में ही चक्कर लगाना शुभ माना जाता है। क्योंकि दूल्हन यानि लड़की को भी किसी पर्व-त्योहारों में नाचना वामावर्ती दिशा (एतोम कुटि यते —- कुटि ते) Anti-clockwise में ही घूमने को पवित्र प्रचलन होता है।

सिंदूर दान के समय दूल्हा पश्चिम दिशा की ओर मुँह करके खड़ा होता है। दूल्हा अपने अगूठें उंगली से दुल्हन को सात बार सिंदूर दान करता है। और दूल्हन का नाक से उपर की ओर यानी कपाल की ओर लगाने को संकेत शुभ माना जाता है। यह प्रचलन इसलिए कि अंगुठे उंगली का तात्पर्य पवित्र माड. बुरु को साक्षी माना जाता है।

सिंदुर दान के समय दूल्हन पूरब दिशा की ओर मुँह करके खड़ी होती है। दूल्हन अपने तर्जनी उंगली से दूल्हा को सात बार सिंदूर दान करती है। और दूल्हा का कपाल से उपर की ओर यानी नाक की ओर लगाने का संकेत शुभ माना जाता है। यह प्रचलन इसलिए कि तर्जनी उंगली तात्पर्य पवित्र देषाउलि को साक्षी माना जाता है।

सिंदूर दान के बाद दूल्हन को दूल्हा के द्वारा लोहा का चूड़ी पहनाना अनिवार्य माना जाता हैं। और वह भी बायें हाथ में ही पहनाने का पवित्र रिवाज है। क्योंकि दूल्हन उसकी आंगिनी के रुप में स्वीकार करता है।

इस लोहा का चूड़ी को व्रत एवं उपवास में ही लोहार के द्वारा बनवाया जाता है। उस लोहा का चूड़ी में 9 जगह रेखाएँ होती हैं। और प्रत्येक जगह 3-3 करके रेखांकित किये जाने का पवित्र रिवाज होता है। इस प्रकार से कुल रेखाओं की संख्या 27 होती हैं। 9 जगह रेखा करने का अर्थ होता है, 9-ग्रहों को शांत करना और कुल 27 रेखाओं का अर्थ होता है, 27 नक्षत्रों का आभार एवं मान-सम्मान करना होता है।

हो समुदाय में मंगल सूत्र का माला भी अलग प्रकार के ही होते हैं। दूल्हा के द्वारा दुल्हन को जो मंगल सूत्र का माला पहनाया जाता है उसमें कोराट का फूल (गोलाचि बहा) की संख्या 27 होती हैं। यह इसलिए होता है कि 27 नक्षत्रों का आभार एवं सम्मान करना होता है। उसी प्रकार से दूल्हन के द्वारा दूल्हा को जो मंगल सूत्र का माला पहनाया जाता है उसमें कोराट का फूल (गोलाचि बहा) की संख्या 28 होती हैं। यह इसलिए होता है, कि 28 संख्या पति की दीर्घायु का सम्मान करना होता है।

अंत मे दूल्हा एवं दूल्हन को बेदी शाल से घर के अन्दर और घर के अन्दर से बाहर सात बार कमर में गोदी करके ( हेबे अदेर) प्रवेश कराने का पवित्र रिवाज होता है। यह इसलिए कि सात जन्म तक के जीवन साथी के रुप में आनन्द एवं सुखी जीवन व्यतीत करने का प्रतीक माना जाता है।

हो समुदाय में अपने पवित्र अदिड. में नयीं दूल्हन को रसोई खान-पान (जोम इसिड.) करने का पवित्र रिवाज होता है। इस दिन सारे घर-आँगन को गोबर को लेपन कर साफ-सुथरा किये जाते हैं। सारे घर को एक लोटा हल्दी पानी में 7 आम की पतियों एवं 3 धूब घास से प्रायश्चित करने का पवित्र रिवाज है। पवित्र अदिड. में कुम्हार का नया हण्डी में नयी दूल्हन के द्वारा भात पकाया जाता है।और इसे अपने पूर्वज आत्माओं को इष्ट प्रसादी चढ़ाने का पवित्र रिवाज माना जाता है। सामथर्य के अनुसार नयी दूल्हन को अपने पवित्र अदिड. में लाल मुर्गी का बलि ( हड् करसा) चढ़ा कर जोम इसिड. करने को रिवाज होता है। हो समुदाय में अनजानों को पवित्र अदिड. में प्रवेश करना वर्जनीय माना जाता है। क्योंकि हो समुदाय में अदिड. को वंशज गोत्र मन्दिर के रुप में जाना एवं माना जाता है।

हो समुदाय में अपने पवित्र अदिड. में नयी दूल्हन को दो बार रसोई खान-पान ( जोम इसिड.) करने को पवित्र रिवाज होता है। जैसे-(क) शादी-विवाह के बाद सामान्य रसोई खान-पान (जोम इसिड. अण्डोः वोड. अदेर) तथा (ख) पर्व-त्योहार में रसोई प्रसादी ग्रहण (जो सुटम अण्डोः वोडा अदेर)।

हो समुदाय के अनुसार नयी दूल्हन को सिर्फ दो उपलक्ष में ही रसोई प्रसादी ग्रहण (जोम सुटम अण्डोः वोडा अदेर) करने का पवित्र रिवाज होता है। एक उपलक्ष्य बहा पोरोब के बहा गुरिः उलं(दिन) और दूसरा हेरोः पोरोब के हेरोः गुरिः उलं (दिन) होता है। क्योंकि, बहा गुरिः उलं प्रकृति में शांति का अंकुर दिन माना जाता है। और हेरोः गुरिढ उलं प्राकृतिक शंति का विश्राम दिन माना जाता है। इसलिए हो समुदाय में बहा पोरोब के बाद शिकार खेलने का प्रचलन हुआ। और हेरोः गुरिः की संध्या को हल में होलोड. चढ़ाने का रिवाज हुआ।

बहा पोरोब के उपलक्ष्य में बहा गुरिः के दिन ही नयी दूल्हन को अपने पवित्र अदिड. में लाल मुर्गी का बलि (हड् करसा) चढ़ा कर रसोई खान-पान (जोम इसिड्) करने का पवित्र रिवाज है। बहा पोरोब के पश्चात शादी-विवाह होने पर हेरोः पोरोब के उपलक्ष्य में भी जोम इसिड. करने का पवित्र रिवाज होता है। उस दिन से पवित्र अदिड. में प्रत्येक पर्व-त्योहारों में पूजा प्रसादी के लिए भोजन पकाने और ग्रहण करने का अधिकार माना जाता है।

हो समुदाय में हेरोः पोरोब के उपलक्ष्य मे भी हेरोः गुरिः के दिन ही नयी दूल्हन को अपने पवित्र अदिड. में लाल मुर्गी का बलि (हड् करसा) चढ़ा कर जोम इसिड. करने का पवित्र रिवाज होता है। यह शादी-विवाह संस्कार का

अन्तिम पवित्र चरण माना जाता है। और उस दिन से पवित्र अदिड. में प्रत्येक पर्व-त्योहारों में पूजा के लिए भोजन पकाने प्रसादी ग्रहण करने का अधिकार माना जाता है।

Categories: Tradition

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